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#2801
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![]() ![]() Join Date: 6th June 2009 Location: NHB Posts: 2,564 Rep Power: 12 Points: 3499 + 25 Added. Repped. |
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#2802
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NTS for u buddy
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#2803
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छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के . . .
फिल्म : चंपाकली (१९५७)
गीत : राजेंद्र कृष्ण संगीत : हेमंतकुमार स्वर : लता मंगेशकर छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के छुप गया ... आज हैं सूनी सूनी, दिल की ये गलियाँ बन गईं काँटे मेरी, खुशियों की कलियाँ प्यार भी खोया मैने, सब कुछ हार के दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के छुप गया ... अँखियों से नींद गई, मनवा से चैन रे छुप छुप रोए मेरे, खोए खोए नैन रे हाय यही तो मेरे, दिन थे सिंगार के दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के छुप गया ... |
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#2804
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उन से नज़रें मिली और हिजाब आ गया . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : लता मंगेशकर , मीनू पुरुषोत्तम उन से नज़रें मिली और हिजाब आ गया ज़िंदगी में हसीन इन्क़िलाब आ गया बेखबर थे उमर के तक़ाज़ों से हम हमको मालूम न था ऐसे भी दिन आयेंगे आइना देखे तो आप अपने से शरमायेंगे आज जाना कि सच मुच शबाब आ गया आँख झुकती है क्यों साँस रुकती है क्यों इन सवालों क खुद से जवाब आ गया दिल के आने को हम किस तरह रोकते जिसपे आना था ख़ाना खराब आ गया |
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#2805
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अदा क़ातिल नज़र बर्क़-ए-बला . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : आशा भोंसले हाँ आँ आँ अदा क़ातिल नज़र बर्क़-ए-बला यूँ भी है और यूँ भी बला यूँ भी है और यूँ भी मोहब्बत करने वालों की क़ज़ा यूँ भी है और यूँ भी क़ज़ा यूँ भी है और यूँ भी आ आ ( कभी चिलमन उठा देना कभी चिलमन गिरा देना ) -२ कभी चिलमन गिरा देना सितमगर नाज़नीनों की अदा यूँ भी है और यूँ भी अदा यूँ भी है और यूँ भी आ आ ( हमें चाहा तो क्यूँ चाहा हमें भूले तो क्यूँ भूले ) -२ हमें भूले तो क्यूँ भूले -२ हाय सज़ा हम क्यूँ न दे उनकी ख़ता यूँ भी है और यूँ भी ( ख़ता यूँ भी है और यूँ भी ) -२ अदा क़ातिल नज़र बर्क़-ए-बला यूँ भी है यूँ भी बला यूँ भी है और यूँ भी |
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#2806
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दिल खुश है आज उनसे मुलाक़ात हो गयी . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : मोहम्मद रफ़ी दिल खुश है आज उनसे मुलाक़ात हो गयी गो दूर ही से बात हुई बात हो गयी उनसे हमारा कोई त'आल्लुक़ तो बन गया बिगड़े भी वो अगर तो बड़ी बात हो गयी धड़कन बढ़ी तो साँस की खुशबू बिखर गयी आँचल उड़ा तो रंग की बरसात हो गयी जी चाहता है मान भी लें, अब ख़ुदा को हम जिसका यकीं न था वो क़रामात हो गयी |
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#2807
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इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : मोहम्मद रफ़ी इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ |
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#2808
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ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : मोहम्मद रफ़ी ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुम को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी मेरी महबूब पस-ए-पदर्आ-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता मुदर्आ शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली अपने तारीक मकानों को तो देखा होता अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के लेकिन उन के लिये तश्हीर का सामान नहीं क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे ये इमारात-ओ-मक़ाबिर ये फ़सीलें, ये हिसार मुतल-क़ुल्हुक्म शहं_शाहों की अज़मत के सुतूँ दामन-ए-दहर पे उस रंग की गुलकारी है जिस में शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़्हूँ मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी जिनकी सन्नाई ने बख़्ह्शी है इसे शक्ल-ए-जमील उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ंदील ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़ इक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे |
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मुझे ये फूल न दे तुजह्को दिलबरी की क़सम . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : मोहम्मद रफ़ी , सुमन कल्याणपुर मुझे ये फूल न दे तुजह्को दिलबरी की क़सम ये कुछ नहीं हैं तेरी सादगी की क़सम नज़र हसीं है तो जलवे हसीन लगते हैं मैं कुछ नहीं हूँ मुझे मेरी हुस्नगी की क़सम तू एक साज़ है छेड़ा नहीं किसी ने जिसे तेरे बदन में छुपी नर्म रागिनी की क़सम ये रागिनी तेरे दिल में है मेरे तन में नहीं परखने वाले मुझे तेरी सादगी की क़सम ग़ज़ल का नाज़ है तू नज़्म का शबाब है तू यकीन कर मुझे मेरी ही शायरी की क़सम |
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नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ . . .
फिल्म : ग़ज़ल (१९६४)
गीत : साहिर लुधियानवी संगीत : मदनमोहन स्वर : लता मंगेशकर नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ ये छलकते हुए जज़बात किसे पेश करूँ शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊं किस पर मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात किसे पेश करूँ गर्म सांसों में छिपे राज़ बताऊँ किसको नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ कोइ हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले दिल की धड़कन के इशारत किसे पेश करूँ |